सेना की जान ज़रूरी है! | देशभक्ति पर कविता

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देशभक्ति पर कविता / Hindi Poem on Patriotism


सेना की जान जरूरी है,
या जबरन का मानवाधिकार जरूरी है?
जब बात देश की गरिमा की हो,
तो क्या अभिव्यक्ति का अधिकार जरूरी है?
बात बहुत हुई बरसों-तरसों,
अब एक लात जरूरी है।।
छोड़ो चर्चा पैलेट गन पर,
सर्जिकल स्ट्राइक दो-चार जरूरी है।।
जब तक ख़तम हों ना जाएं ये कीड़े,
गोली की बौछार जरूरी है।।
बुजदिल हमला करते छिप-छिप कर हम पर,
अब कुनबे मेें भी उनके हाहाकार जरुरी है।।
चोटिल होती माँ की ममता घायल आँचल जिनसे है,
सीना ताने वो चलते हैं, अब उनकी हार जरुरी है ।।
बेसुध बैठी है जनता हम खुद ही खुद मेें उलझे है,
जो सुलगे ना हम इन बलिदानों पर तो खुद पे धिक्कार जरुरी है।।
काटे घर में बैठे दुश्मन एक ऐसी तलवार जरुरी है,
सेना की जान ज़रूरी हैसेना की जान ज़रूरी है

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